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जल-विज्ञान के क्षेत्र में रोजगार

जल-विज्ञान पानी की वायुमण्डल के जरिए, भूमि-तल और भूमिगत क्रियाओं से संबंधित विज्ञान है। इसमें पृथ्वी की चट्टानों और खनिजों के साथ पानी की भौतिक, रासायनिक और जैविक अन्योन्यक्रियाओं के साथ-साथ सजीव शरीर-रचनाओं के साथ इसकी विवेचनात्मक पारस्परिक क्रियाएं सम्मिलित हैं। जल विज्ञान से जुड़ा व्यवसायी जल विज्ञानी कहलाता है जो कि पृथ्वी या पर्यावरणीय विज्ञान, भौतिक भूगोल या सिविल और पर्यावरणीय इंजीनियरिंग के क्षेत्रों में काम कर रहे होते हैं। जल विज्ञान के क्षेत्र में हाइड्रोमिटिरोलॉजी, भूतल, जल विज्ञान, हाइड्रोजिओलॉजी, ड्रेनेज बेसिन मैनेजमेंट और जल गुणवत्ता से संबंधित विषय आते हैं, जहां पानी की केंद्रीय भूमिका रहती है। समुद्र-विज्ञान और मौसम विज्ञान को इसमें शामिल नहीं किया गया है क्योंकि इनमें पानी कई महत्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है। जल-विज्ञान अनुसंधान बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे हमें विश्व को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है, जहां हम रहते हैं, और साथ ही पर्यावरणीय इंजीनियरिंग, नीति तथा नियोजन की भी पूरी जानकारी उपलब्ध् होती है। जल विज्ञान सहस्त्राब्दि से इंजीनियरी और खोज का विषय रहा है। उदाहरण के लिए करीब 4000 ईसा पूर्व बंजर भूमि की कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए नील पर बांध् बनाया गया था। ऊंची दीवारों के साथ बाढ़ से मेसोपोटेनियम कस्बों की सुरक्षा की गई। यूनानी और प्राचीन रोमन्स द्वारा जलसेतुओं का निर्माण किया गया, जबकि चीन का इतिहास दर्शाता है कि उन्होंने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े निर्माण कार्य किए हैं। प्राचीन सिंहलियों ने श्रीलंका में जटिल सिंचाई निर्माण कार्यों में जल विज्ञान का इस्तेमाल किया। इन्हें वाल्व पिट के अन्वेषण के लिए भी जाना जाता है जिससे बड़े जलाशयों और नहरों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ जो आज भी काम कर रहे हैं।
ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में मार्क्स वितरुवियस ने जल-वैज्ञानिक चक्र के दार्शनिक सिद्वांत की व्याख्या की जिसके अनुसार पहाड़ियों में होने वाले वृष्टिपात से पृथ्वी के तल में पानी का रिसाव हुआ और इससे निचलीभूमि में दरिया और झरना आदि बन गए। अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिओनार्डो द विन्सी और बर्नाड पॉलिस्सी स्वतंत्र रूप से जल-वैज्ञानिक चक्र के सही निरूपण तक पहुंचे। 17वीं शताब्दी तक ऐसा कुछ नहीं था कि जल-वैज्ञानिक परिवर्तनों का परिमाणन शुरू हो गया हो। जल-विज्ञान के आधुनिक शास्त्र के पथ-प्रदर्शकों में पाइरी पेरॉल्ट, एडम मैरिएट और एडमंड हैले शामिल हैं। 18वीं सदी में हुई प्रगति में डेनियल बर्मौली द्वारा तैयार बर्मौली पाइजोमीटर तथा बर्मौली समीकरण पायलट ट्यूब सम्मिलित हैं। 19वीं सदी में भूमिजल जल-विज्ञान के क्षेत्र में काफी विकास दिखाई दिया। 20वीं सदी में अनुभववाद का स्थान लेने के वास्ते उस समय बुद्विसंगत विश्लेषणों की शुरुआत हुई जब सरकारी एजेंसियों ने अपने स्वयं के जल-वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यक्रमों की शुरुआत की। इनमें विशेष रूप से महत्वपूर्ण लेटॉप शेरमैन की इकाई हाइड्रोग्राफ, राबर्ट ई. हार्टन का अंतःस्राव का सिद्वांत और सी.वी. थिइस के एक्युफर परीक्षण/समीकरण था जिनके अनुरूप द्रव-इंजीनियरी की व्याख्या अच्छी तरह से की गई। 1950 के दशक से जल-विज्ञान के बारे में पूर्व की अपेक्षा अधिक सैद्वान्तिक आधार का दृष्टिकोण अपनाया गया और इसमें जल-विज्ञान प्रक्रियाओं की भौतिक समझ तथा कम्प्यूटरों की खोज तथा विशेष रूप से भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) में हुई प्रगति ने काफी योगदान किया।
जल विज्ञान की शाखाएं…
1-रासायनिक जल विज्ञान पानी के रासायनिक गुणों का अध्ययन।
2-पारिस्थितिकी जल विज्ञान जीवित वस्तुओं और जल-वैज्ञानिक चक्र के बीच पारस्परिक- क्रियाओं का अध्ययन।
3-हाइड्रोजियोलॉजी ऑक्विफर्स में पानी की मौजूदगी तथा चलन-क्रिया का अध्ययन।
4-हाइड्रोइन्फारमैटिक्स जल विज्ञान और जल संसाधन अनुप्रयोगों में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुकूलन।
5-हाइड्रो मिटियोरोलॉजी भूमि और जल भरनों तथा निचले वातावरण के बीच पानी और ऊर्जा के स्थानांतरण का अध्ययन। पानी के आइसोटोपिक सिग्नेचर्स का आइसोटोप हाइड्रोलॉजी अध्ययन।
6-भूतल जल-विज्ञान पृथ्वी के तल के निकट संचालित होने वाली जल विज्ञान प्रक्रियाओं का अध्ययन।
जल-वैज्ञानिक क्या काम करते हैं?
जल-वैज्ञानिक जलीय पर्यावरण की सुरक्षा, निगरानी और प्रबंधन के लिए व्यापक गतिविधियां संचालित करते हैं। हाइड्रोमीट्रिक डाटा मिजरमेंट, संग्रहण और आर्काइविंग के बगैर बहुत से अध्ययन और गतिविधियां असंभव हैं। जल-विज्ञान के तहत अधिकतम काम में इस तरह के डाटा की व्याख्या तथा विश्लेषण संबंधी गतिविधियां शामिल हैं, और जल-वैज्ञानिक निरंतर उनके द्वारा जांच की जाने वाली भौतिक प्रक्रियाओं की अनुकरणात्मकता के लिए गणितीय मॉडल्स का विकास तथा प्रयोग करते हैं। एक जल-वैज्ञानिक की गतिविधियों में मुख्यतः शामिल हैं:-
हाइड्रोमीट्रिक और जल गुणवत्ता मापन…
1-नदियों, झीलों और भूमिजल के जल स्तरों, नदियों के प्रवाह, वर्षा और जलवायु परिवर्तनों को दर्ज करने वाले निगरानी नेटवर्कों का रखरखावय
2-पानी के नमूने लेना तथा उनके रासायनिक विश्लेषण करना।
3-नदियों तथा झीलों की स्थितियों की निगरानी के लिए जीव-विज्ञानियों और पारिस्थितिकीविदों के साथ कार्य करना।

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