Bihar News: रामविलास पासवान को ‘बेचारा’ कहने पर बवाल, चिराग पासवान की लोजपा ने तेजस्वी के खिलाफ खोला मोर्चा
Bihar News: बिहार की राजनीति में शब्दों के बाण अक्सर बड़े घाव कर जाते हैं, लेकिन इस बार मामला किसी जीवित नेता का नहीं, बल्कि सूबे के उस कद्दावर व्यक्तित्व का है जिसे ‘मौसम वैज्ञानिक’ और दलितों का मसीहा कहा जाता था। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान को लेकर विधानसभा में इस्तेमाल किए गए एक शब्द ‘बेचारा’ ने सूबे की सियासत में उबाल ला दिया है। बजट सत्र की कार्यवाही अब विकास के मुद्दों से हटकर ‘सम्मान बनाम अपमान’ की जंग में तब्दील हो गई है।
एक शब्द और सुलगती सियासत
वाकया बीते बुधवार का है, जब बोधगया से आरजेडी विधायक कुमार सर्वजीत सदन में अपनी बात रख रहे थे। उन्होंने रामविलास पासवान की राजनीतिक यात्रा का सम्मान करते हुए पटना में उनकी आदमकद मूर्ति लगाने की मांग तो की, लेकिन इसी दौरान उनके मुंह से निकला शब्द ‘बेचारा’ एनडीए खेमे को चुभ गया। देखते ही देखते सदन का माहौल बदल गया। लोजपा (रामविलास) के विधायकों ने इसे दलितों की अस्मिता से जोड़ते हुए मोर्चा खोल दिया।
सदन के भीतर ‘आरजेडी की पहचान, दलितों का अपमान’ के नारे गूंजने लगे। पोस्टर लहराए गए और सीधे तौर पर तेजस्वी यादव को निशाने पर लिया गया। रविवार को यह गुस्सा सड़कों पर उतरा, जब पटना के ऐतिहासिक करगिल चौक पर चिराग पासवान की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने तेजस्वी यादव का पुतला फूंका।
चिराग का भावुक प्रहार और आरजेडी की ‘अड़ियल’ दलील
चिराग पासवान ने इस मुद्दे पर बेहद आक्रामक और भावुक रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि उनके पिता ने 50 वर्षों तक बेदाग और स्वाभिमानी राजनीति की है, उन्हें ‘बेचारा’ कहना करोड़ों वंचितों की भावनाओं को आहत करना है। चिराग की मांग साफ है—सार्वजनिक माफी।
दूसरी ओर, कुमार सर्वजीत और आरजेडी इस पर झुकने को तैयार नहीं हैं। सोमवार (16 फरवरी) को भी सदन में इस पर जमकर हंगामा हुआ। सर्वजीत का तर्क है कि ‘बेचारा’ शब्द कोई गाली नहीं है और उनकी मंशा सिर्फ यह बताने की थी कि पासवान जी के साथ राजनीति में कैसा व्यवहार हुआ। आरजेडी इसे एनडीए की एक सोची-समझी साजिश बता रही है ताकि जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया जा सके।
क्यों इतना बड़ा हो गया यह विवाद?
जानकारों की मानें तो यह सिर्फ एक शब्द की लड़ाई नहीं है, बल्कि बिहार के दलित वोट बैंक पर कब्जे की जद्दोजहद है।
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विरासत की जंग: रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी विरासत पर चिराग पासवान का मजबूत दावा है। आरजेडी विधायक का यह बयान चिराग को अपने समर्थकों के बीच यह साबित करने का मौका दे रहा है कि आरजेडी आज भी दलित नेताओं का सम्मान करना नहीं जानती।
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समीकरणों का खेल: बिहार में आगामी चुनावों (या संभावित राजनीतिक बदलावों) को देखते हुए एनडीए इस मुद्दे को ‘एंटी-दलित नैरेटिव’ के रूप में भुनाना चाहती है।
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भावनाओं का ज्वार: रामविलास पासवान के चाहने वाले हर दल में हैं। ऐसे में उन्हें ‘बेचारा’ कहना एक बड़े तबके को मनोवैज्ञानिक रूप से कचोट रहा है।
फिलहाल, सदन की कार्यवाही बाधित है और राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। कुमार सर्वजीत के माफी न मांगने के फैसले ने इस आग में घी डालने का काम किया है। देखना यह होगा कि क्या नीतीश सरकार और स्पीकर प्रेम कुमार इस गतिरोध को सुलझा पाते हैं या ‘बेचारा’ शब्द बिहार की राजनीति का नया टर्निंग पॉइंट बनेगा।
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