मिडिल ईस्ट में ‘महायुद्ध’ की आहट: क्या रमजान से पहले ईरान पर होगा अब तक का सबसे बड़ा हमला? अमेरिका की घेराबंदी तेज
मिडिल ईस्ट में युद्ध के काले बादल गहरा रहे हैं। अमेरिका और इजराइल की बढ़ती सैन्य सक्रियता और जिनेवा वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद अब ईरान पर एक बड़े हमले की आशंका जताई जा रही है। क्या अगले 14 दिन दुनिया का नक्शा बदल देंगे?
- मिडिल ईस्ट में अभूतपूर्व युद्ध की बिसात
- रमजान के पवित्र महीने पर सैन्य टकराव का साया
- जिनेवा वार्ता के बाद कूटनीति की आखिरी सांसें
- पेंटागन की ‘ब्लू-प्रिंट’ और इजराइल का साथ
न्यूज़ डेस्क, वॉशिंगटन/तेहरान: मिडिल ईस्ट की धरती एक बार फिर बारूद की गंध से भारी होने लगी है। कूटनीति की मेज पर सजी उम्मीदें अब धुआं होती दिख रही हैं और उनकी जगह ले ली है युद्ध के नगाड़ों ने। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब उस मुहाने पर खड़ा है, जहाँ से वापसी का रास्ता लगभग बंद नजर आता है।
हालिया सैन्य हलचल और वॉशिंगटन से आ रहे संकेत इशारा कर रहे हैं कि पेंटागन किसी छोटे-मोटे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यापक सैन्य अभियान (Full-scale Military Action) की तैयारी में है, जो हफ्तों तक चल सकता है।
वेनेजुएला से भी बड़ी कार्रवाई की तैयारी?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की तैयारी पिछली किसी भी कार्रवाई से कई गुना बड़ी है। पिछले दिनों वेनेजुएला में अमेरिका का एक्शन महज एक ट्रेलर भर था। ईरान के मामले में खाका अलग है।
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यहाँ लक्ष्य सिर्फ डराना नहीं, बल्कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को पूरी तरह पंगु बनाना हो सकता है। यदि यह टकराव शुरू होता है, तो यह केवल दो देशों की जंग नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा ‘शॉक’ साबित होगी।
19 फरवरी और रमजान का ‘डेडलाइन’ फैक्टर
दुनिया भर के मुसलमान 19 फरवरी से रमजान के पवित्र महीने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन सामरिक गलियारों में इस तारीख को एक ‘क्रिटिकल विंडो’ के तौर पर देखा जा रहा है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका अपनी कूटनीतिक कोशिशों को आखिरी मौका दे रहा है, लेकिन अगर परमाणु समझौते पर कोई ठोस सहमति नहीं बनी, तो रमजान के दौरान या उससे ठीक पहले सैन्य विकल्प आजमाया जा सकता है।
उप-राष्ट्रपति माइक पेंस का हालिया बयान कि “कूटनीति विफल हुई तो विकल्प खुले हैं”, आग में घी डालने का काम कर रहा है।
जिनेवा की ‘गुप्त’ बैठक और टूटती उम्मीदें
हाल ही में जिनेवा के बंद कमरों में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी प्रतिनिधियों (जेरेड कुशनर व स्टीव विटकॉफ) के बीच तीन घंटे तक माथापच्ची हुई।
हालांकि बाहर आकर ‘प्रगति’ की बात कही गई, लेकिन हकीकत यह है कि बुनियादी मुद्दों पर दोनों पक्ष टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। ईरान अपनी संप्रभुता और परमाणु कार्यक्रम पर अडिग है, तो अमेरिका अपनी शर्तों से पीछे हटने को राजी नहीं।
इजराइल का साथ और ‘अंडरग्राउंड’ टारगेट
इस संभावित युद्ध में अमेरिका अकेला नहीं है। इजराइल के साथ मिलकर एक ‘ज्वाइंट ऑपरेशन’ की योजना तैयार की गई है।
पिछले साल जून में हुए 12 दिनों के संघर्ष में अमेरिका ने ईरान के भूमिगत परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था, लेकिन इस बार का दायरा उससे कहीं ज्यादा व्यापक होने की उम्मीद है।
पेंटागन ने इस क्षेत्र में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दो एयरक्राफ्ट कैरियर, सैकड़ों फाइटर जेट्स और 150 से अधिक कार्गो विमानों के जरिए हथियारों का जखीरा मिडिल ईस्ट पहुँचाया जा चुका है।
50 नए घातक लड़ाकू विमानों की हालिया तैनाती यह साफ करती है कि अब बात सिर्फ धमकियों तक सीमित नहीं है।
अगले दो हफ्ते निर्णायक: जानकारों का कहना है कि अगले 14 दिन इस पूरे दशक की सबसे बड़ी खबर लेकर आ सकते हैं। क्या मेज पर समझौता होगा या आसमान से मिसाइलें गिरेंगी? इसका फैसला बहुत जल्द होने वाला है।
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