Copper Price Hike: बाज़ार की भाषा में कहें तो तांबा यानी डॉक्टर कॉपर बीमार नहीं है बल्कि मौजूदा समय में वह पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा है। अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ सोना और चांदी ही आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहे हैं तो एक बार बिजली के तारों और घर के बर्तनों में इस्तेमाल होने वाले तांबे की तरफ नज़र डालिए। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर कॉपर के दाम 1,330 रुपये के स्तर को पार कर गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले सत्र में यह 1,309.55 रुपये पर बंद हुआ था लेकिन अब यह जिस रफ़्तार से ऊपर जा रहा है उसने निवेशकों और आम उपभोक्ताओं दोनों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
यह तेज़ी सिर्फ किसी सट्टेबाजी या ट्रेडिंग का नतीजा नहीं है। असल में पूरी दुनिया में तांबे को लेकर एक अजीब सी होड़ मची है। एक तरफ खदानों से माल कम निकल रहा है और दूसरी तरफ भविष्य की नई तकनीकें तांबे के बिना अधूरी हैं।
अमेरिका ने नया दांव चला और दुनिया भर में मची अफरा-तफरी
बाज़ार के गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा अमेरिका के नए टैरिफ को लेकर है। ऐसी खबरें उड़ रही हैं कि अमेरिका रिफाइंड कॉपर पर भारी टैक्स लगा सकता है। अब बड़े खरीदारों और कंपनियों को डर है कि कहीं आने वाले समय में माल महंगा न हो जाए इसलिए उन्होंने अभी से भंडार भरना शुरू कर दिया है। जब बड़े खिलाड़ी बाज़ार से माल उठाकर गोदामों में भरने लगते हैं तो सप्लाई कम हो जाती है और कीमतें आसमान छूने लगती हैं। यही खेल इस वक्त ग्लोबल मार्केट में चल रहा है।
कुदरत की मार और मज़दूरों की नाराज़गी
तांबे की इस किल्लत के पीछे सिर्फ नीतियां नहीं बल्कि कुदरत का भी हाथ है। दुनिया को सबसे ज्यादा तांबा देने वाले देश चिली और पेरू इस वक्त मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। वहां कभी बेहिसाब बारिश और बाढ़ माइनिंग के काम को रोक देती है तो कभी मज़दूर अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले जाते हैं। राजनीतिक उठापटक ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। खदानों से तांबा निकल नहीं पा रहा है और मांग है कि थमने का नाम नहीं ले रही।
AI का शोर और सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियां
आजकल हम और आप जिस आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस यानी AI की बात कर रहे हैं उसे चलाने वाले डेटा सेंटर्स और हाई-टेक सर्वर्स असल में तांबे के दम पर ही ठंडे और चालू रहते हैं। इनमें इस्तेमाल होने वाली भारी-भरकम वायरिंग के लिए तांबा अनिवार्य है। वहीं दूसरी ओर प्रदूषण कम करने के लिए हम जिस इलेक्ट्रिक गाड़ी (EV) का सपना देख रहे हैं उसे बनाने में साधारण पेट्रोल कार के मुकाबले कई गुना ज्यादा तांबा लगता है। चाहे सोलर पैनल हो या विंड मिल, क्लीन एनर्जी का हर रास्ता तांबे की गली से होकर ही गुजरता है।
चीन इस पूरे खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। वहां तांबे की खपत इतनी ज्यादा है कि जैसे ही भाव थोड़े गिरते हैं चीन खरीदारी शुरू कर देता है जिससे दाम फिर ऊपर चढ़ जाते हैं।
आगे क्या होगा?
जानकारों का मानना है कि फिलहाल तांबे के तेवर कम होने वाले नहीं हैं। हां, बीच-बीच में थोड़े उतार-चढ़ाव आ सकते हैं जिससे शायद कुछ राहत मिले लेकिन लंबी रेस में तांबा अभी और चमकने वाला है। आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में घर की वायरिंग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक की कीमतें आपके जेब पर थोड़ा और बोझ डाल सकती हैं।
