Haryana News: हरियाणा के ऊर्जा सपनों को एक बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने एक कड़ा फैसला लेते हुए झारखंड स्थित कल्याणपुर-बदलापारा कोल ब्लॉक के आवंटन को रद्द करने का फरमान जारी कर दिया है। यह वही खदान है जिसे पाने के लिए हरियाणा ने करीब 18 साल तक लंबा इंतजार किया था। अब जब काम पटरी पर लौटता दिख रहा था, केंद्र के इस नोटिस ने प्रदेश सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है।
साढ़े 2 करोड़ स्वाहा और डेढ़ साल की मेहनत पर पानी फेरने का डर
सरकार की ओर से इस मामले में जवाब दाखिल कर दिया गया है। हरियाणा पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड पिछले डेढ़ साल से दिन-रात इस ब्लॉक को विकसित करने में जुटा था। अब तक करीब 2.5 करोड़ रुपए जमीन की फेंसिंग और डिमार्केशन (सीमांकन) जैसे कामों पर खर्च हो चुके हैं। हरियाणा के ऊर्जा मंत्री अनिल विज का कहना है कि हमने केंद्र को अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। सरकार का तर्क है कि हम इस प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर हैं और इतनी मेहनत के बाद आवंटन रद्द करना प्रदेश के साथ नाइंसाफी होगी।
आखिर कहां फंस गया पेंच? नक्सलियों का खौफ और एजेंसी की लेटलतीफी
इस पूरे विवाद के पीछे तीन बड़ी वजहें सामने आई हैं। पहली और सबसे बड़ी चुनौती तो इस ब्लॉक का भूगोल है। झारखंड का यह इलाका नक्सल प्रभावित है, जिसकी वजह से वहां काम करना किसी चुनौती से कम नहीं रहा। दूसरी वजह सर्वे एजेंसी की सुस्ती रही। केंद्रीय कोयला मंत्रालय की सर्वे एजेंसी ने खुद आवंटन में देरी की, जिससे हरियाणा सरकार का काम भी पिछड़ गया।
हैरानी की बात यह है कि हरियाणा सरकार ने कई बार पत्र लिखकर एजेंसी से संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन वहां से जवाब नदारद रहे। यानी जिस काम में तेजी की उम्मीद थी, वह कागजी कार्रवाई और जमीनी डर के बीच कहीं दबकर रह गया।
यमुनानगर प्लांट के लिए ‘संजीवनी’ था यह कोयला
यह सिर्फ एक खदान का मामला नहीं है, बल्कि हरियाणा के घरों में आने वाली बिजली का सवाल है। यमुनानगर के दीनबंधु छोटू राम थर्मल पावर प्लांट के लिए यह ब्लॉक एक लाइफलाइन की तरह था। इस प्लांट की 600 मेगावाट की क्षमता को बढ़ाने के लिए हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 800 मेगावाट की नई यूनिट का शिलान्यास किया था।
सरकार की योजना थी कि जब तक यह नया प्लांट बनकर तैयार होगा, तब तक कल्याणपुर-बदलापारा खदान से कोयला निकलना शुरू हो जाएगा। अनुमान है कि यहां 102.35 मिलियन टन कोयले का भंडार है। अगर यह आवंटन रद्द रहता है, तो भविष्य में हरियाणा को महंगे कोयले या बिजली संकट का सामना करना पड़ सकता है।
अब आगे क्या?
फिलहाल गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। हरियाणा ने आग्रह किया है कि उसे काम जारी रखने की अनुमति दी जाए। अगर केंद्र अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो 18 साल की यह तपस्या और करोड़ों रुपए का निवेश मिट्टी में मिल जाएगा। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की चौखट पर हरियाणा की दलीलें कितनी कारगर साबित होती हैं।
