हरियाणा के सरकारी गलियारों में अब बरसों से चले आ रहे कुछ शब्दों की विदाई होने जा रही है। प्रदेश सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए सभी विभागों को दो-टूक कह दिया है कि सरकारी कामकाज, चिट्ठी-पत्री या किसी भी आधिकारिक दस्तावेज में अब ‘हरिजन’ और ‘गिरिजन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कतई नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर निचले स्तर के दफ्तरों तक यह निर्देश साफ कर दिए गए हैं कि अब सिर्फ और सिर्फ संविधान में दर्ज ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्दों का ही प्रयोग होगा।
यह फैसला महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की पहचान और सम्मान से जुड़ा मामला है। दरअसल, काफी समय से यह मांग उठती रही है कि जो शब्द संविधान की मूल भावना में शामिल नहीं हैं, उनका इस्तेमाल आधिकारिक तौर पर क्यों किया जा रहा है? हरियाणा सरकार ने अब केंद्र सरकार के पुराने निर्देशों का हवाला देते हुए राज्य के सभी महकमों की ‘क्लास’ लगा दी है।
हैरानी की बात यह है कि सरकार ने पहले भी इस तरह के निर्देश जारी किए थे, लेकिन सरकारी फाइलों की रफ्तार और पुरानी आदतों ने इन शब्दों को दफ्तरों से बाहर नहीं होने दिया। सरकार के संज्ञान में आया कि आज भी कई विभाग अनजाने में या पुरानी परिपाटी के चलते इन्हीं प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी सुस्ती को देखते हुए इस बार सरकार का लहजा सख्त है और अधिकारियों को चेतावनी दी गई है कि भविष्य में ऐसी गलती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
संविधान सर्वोपरि, शब्दावली में सुधार की ज़रूरत
कानूनी और संवैधानिक नज़रिए से देखें तो भारत के संविधान में कहीं भी ‘हरिजन’ या ‘गिरिजन’ शब्दों का जिक्र नहीं है। वहां स्पष्ट रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का ही उल्लेख है। जानकारों का मानना है कि शब्दों का चुनाव केवल भाषा का विषय नहीं होता, बल्कि यह उस वर्ग के प्रति संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादा का प्रतीक भी है। जब संविधान ने एक स्पष्ट पहचान दी है, तो सरकारी दस्तावेजों में किसी और संबोधन की जगह नहीं बचती।
इस कदम का असर ज़मीनी स्तर पर भी दिखेगा। अक्सर ग्रामीण इलाकों या छोटे शहरों के सरकारी दफ्तरों में फॉर्म भरते समय या जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी प्रक्रियाओं में इन पुराने शब्दों का प्रयोग देख लिया जाता था। अब नए आदेश के बाद भर्ती प्रक्रियाओं, कल्याणकारी योजनाओं के विज्ञापनों और विभागीय रिपोर्टों में भाषा पूरी तरह बदल जाएगी। यह बदलाव इस बात की तस्दीक करता है कि अब प्रशासन अपनी कार्यशैली को आधुनिक और संवैधानिक रूप से पूरी तरह सटीक बनाना चाहता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के इन कड़े निर्देशों का असर कितनी जल्दी दफ्तरों की फाइलों पर दिखता है। क्या सालों पुरानी यह शब्दावली वाकई सरकारी रिकॉर्ड से पूरी तरह मिट पाएगी? फिलहाल तो सरकार ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि नियमों की अनदेखी करने वाले अफसरों को अब जवाब देना पड़ सकता है।
